हाल ही में अमेरिका की एक सीनेट Nancy Pelosi की ताइवान यात्रा से ड्रेगन आग- बबूला हो गया है और बार बार बदला लेने की धमकी दे रहा हा, ऐसे में विशेसज्ञ इसे भावी जंग के रूप में देख रहे है. लोगो का मानना है की अमेरिका ताइवान को सिर्फ चीन के खिलाफ बहका रहा है, जरुरत पड़ने पर जंग में मैदान में अपनी सेना को नहीं उतरेगा. जैसा की उसने युक्रेन के साथ किया था. अमेरिका और नाटो के द्वारा युक्रेन को बराबर हर संभव सहयोग का वादा किया था लेकिन युद्ध शुरू होने पर अमेरिका ने कहा की हम अपने सैनिको को विदेशी धरती पर युद्ध के लिए नहीं उतरेंगे. लेकिन आर्थिक और हथियारों की आपूर्ति करवाते रहेंगे इस तरह से लोगो का मानना है की अमेरिका सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए काम करता है उसे छोटे देशो से कोई लेना देना नहीं है.

इसलिए आज के इस आर्टिकल में हम अमेरिका, चीन, रूस, ताईवान और युक्रेन के संदर्भ में यह जानेंगे की अगर युद्ध होता है है तो दुसरे देशो पर इसका क्या पड़ेगा. और भारत जैसे गुटनिरपेक्ष देश किस और रहेंगे. तो सबसे पहले जान लेते है की चीन और ताइवान में लड़ाई के हालात क्यों बने है.

चीन ताइवान युद्ध – कारण, प्रभाव, समर्थक देश, और भारत की भूमिका

चीन-ताइवान युद्ध के कारण – चीन और ताइवान के समर्थक देश – चीन – ताइवान युद्ध और भारत

चीन ताइवान के बीच युद्ध के हालात बने हुए है ऐसे में लोगो के मन में ये बात आ सकती है, आखिर ऐसी तो क्या बात रही होगी जिससे चीन और ताइवान दोनों आपस में एक दुसरे के खून के प्यासे हो रखे है. इसलीये आज हम चीन और ताइवान युद्ध के हालातो की पूरी तरह से समीक्षा करने वाले है जिसमे हम दोनों देशो के भूतकाल और वर्तमान हालातो और अगर युद्ध होता है तो इससे पड़ने वाले हालातो के बारे में अध्ययन करने वाले है. तो सबसे पहले जाण लेते है की चीन और ताइवान के बीच जो जंग के हालत बने हुए है उसका कारण क्या है.

चीन-ताइवान युद्ध के कारण

चीन और ताइवान के युद्ध का मुख्य कारण चीन की सरकार की विस्तारवादी निति है. जिसके तहत वो ताइवान को अपन्वा हिस्सा मानता है लेकिन अमेरिका और दुसरे कई देशो ने ताइवान को स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता दे रखी है जिससे चीन नाराज है. 1950 में जब चीन ने ताइवान पर हमला किया था तो अमेरिका ने ताइवान की सैन्य मदद की थी तब से अमेरिका भी चीन की आँखों में रडक रहा है और उसे भी चीन बार बार गीदड़ भभकी देता रहता है. कुल मिला के ये जंग वर्चस्व की है लेकिन अभी लोकतंत्र बनाम साम्यवाद बनती जा रही है. इसके बारे में हम पूरी जानकारी लेने वाले है इसलिए आर्टिकल को पूरा जरुर पढना.

चीन के समर्थक देश – Supporting countries of China

चीन शुरुआत से ही अपने विस्तारवादी नीतियों के कारण दुनिया की नजरो में बदनाम है चीन के पडोसी देश चीन की इन्ही विस्तारवादी नीतियों के कारण चीन को पसंद नहीं करते है. इसलिए चीन को प्रथम दृष्टया देखा जाये तो पडोसी देशो से चीन को ज्यादा कुछ खास मदद नहीं मिल पायेगी. लेकिन हकीकत कुछ और हो सकती है क्योंकि हर देश के कई तरह के आंतरिक-बाहरी मामले होते है जिनके आधार पर कोई देश विशेष ये निश्चित करता है की अगर जंग के हालत बने तो वो किस देश के साथ खड़ा रहेगा. और किसके खिलाफ ये जंग लडेगा. इसलिए ऐसे ही कुछ कारण है जिनके कारण कई देश चीन की भी सहायता करेंगे. जिनके बारे में आगे हम विस्तार से बात करने वाले है.

पाकिस्तान(Pakistan)

Wikipedia के अनुसार पाकिस्तान का क्षेत्रफल कोई 8,03,940 वर्ग किलोमीटर है. अरब सागर से लगी इसकी समुन्द्री सीमा करीब 1046 KM लम्बी है। इसकी धरातल की सरहद करीब 6,744 KM लम्बी है – उत्तर-पश्चिम (North West)में 2430 KM अफ़ग़ानिस्तान(Afganistan) के साथ, दक्षिण पूर्व(Southeast) में 909 KM ईरान(Iran) के साथ, उत्तर-पूर्व(northeast) में 512 KM चीन(Chaina) के साथ (POK से लगी) तथा पूर्व(East) में 2912 KM भारत(India) के साथ लगती है. 

इस तरह से पाकिस्तान अपनी कुल सीमा में से 512 KM चीन के साथ साझा करता है, चीन ने पाकिस्तान में कई विकास कार्यों में भी पाकिस्तान की मदद की है, जैसे की चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा जिसके तहत चीन ने पाकिस्तान में ग्वादर बंदरगाह से सम्बंधित कार्य 1998 में शुरू किया था जो 2002 में पूरा हुआ था. इतना ही नहीं चीन समय समय पर पाकिस्तान को कर्ज भी देता रहता है जिससे पाकिस्तान मानसिक रूप से चीन का हमदर्द बना हुआ है. चीन सयुंक्त राष्ट्र संघ में भी पाकिस्तान परस्त आंतकवादीयों की मदद करता रहा है.

इस तरह से अगर ताइवान और चीन के बीच युद्ध होता है तो पाकिस्तान बिना शर्त के चीन की हरसंभव मदद करने का प्रयास करेगा.

रूस(Russia)

रूस और युक्रेन के युद्ध से ही प्रेरणा लेकर चीन आज ताइवान को आँख दिखा रहा है अगर बात करें रूस की भौगोलिक स्थिति की तो रूस पूर्वी यूरोप और उत्तरी एशिया तक फैला एक साम्यवादी देश है, साम्यवाद और लोकतंत्र एक दुसरे के दुश्मन रहे है और जब बात लोकतंत्र विरोधी देशो की हो तो चीन को कैसे भूल सकते है चीन एक जनवादी गणराज्य है, जहाँ राजशाही शासन व्यवस्था है इसलिए चीन भी लोकतंत्र विरोधी है इसलिए रूस के सम्बन्ध चीन के साथ शुरुआत से ही अच्छे रहे है.

दूसरा कारण अमेरिका से दुश्मनी है, चीन और रूस अप्रत्यक्ष रूप से समान शत्रु(अमेरिका) से जूझ रहे है, इसलिए दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है. रूस और चीन दोनों देश लोकतंत्र के विरोधी है, जबकि अमेरिका दुनिया में लोकतंत्र स्थापित करना चाहता है इसलिए टकराव ओ होना ही है.

जब रूस ने युक्रेन पर हमला किया तो यूरोप के देशों और अमेरिका ने रूस पर काफी ज्यादा प्रतिबंध लगाये थे. लेकिन चीन ने इन देशो का सहयोग नहीं किया ना ही रूस पर किसी प्रकार के प्रतिबंध लगाये, जब चाइना से रूस प्रतिबंध लगाने का बोला गया तो चीन ने ये कहते हुए साफ़ तौर पर मना कर दिया की, “रूस के साथ हमारे सम्बन्ध काफी अच्छे है और हम रूस पर किसी भी तरह के प्रतिबंध नहीं लगाएंगे”. इस तरह से चीन हमेशा रूस का हमदर्द रहा है. तो ए कयास लगाये जा रहे है की अगर युद्ध होता है तो कहीं ना कहीं रूस चीन का ही सहयोग करेगा.

ताइवान के समर्थक देश – Supporting countries of Taiwan

हमने देखा की कारण चाहे जो भी हो लेकिन चीन अकेला होकर भी अकेला नहीं है रूस और पाकिस्तान जैसे देश

चीन के साथ भी है लेकिन अगर बात की जाये ताइवान समर्थको को तो यहाँ ताइवान का पलड़ा भरी पड़ता नजर आ रहा है. क्योंकि ताईवान के अमेरिका जैसी महाशक्तियो के साथ रक्षा समझौता है इसलिए ताइवान को अमेरिका कभी भी अकेला नहीं छोड़ेगा. क्योंकि जब बात लोकतंत्र की आती है तो अमेरिका की सरकार बड़े ही गर्व से यह बात कहती है की हमने दुनिया को लोकतंत्र दिया है और हम इसकी रक्षा भी करेंगे. इसलिए लोकतान्त्रिक देश ताइवान की साम्यवादी देशो से रक्षा करना स्वाभाविक है.

आइये विस्तार से जानते है की वो कौनसी शक्तिया है जो इस मुश्किल घडी में ताइवान के साथ कड़ी रहेगी..

यूरोपियन देश – European countries

यूरोप की यूरोप के ज्यादातर देश लोकतंत्र समर्थक है और जरुरत पड़ने पर ताइवान की मदद से पीछे नहीं हटेंगे. लेकिन यहाँ पर सिर्फ सहानुभूति या सिर्फ आर्थिक मदद की बात हो रही है. लेकिन अगर यूरोप से अगर सैन्य मदद की आश की जा सकती है तो वो है नाटो(Nato).

नाटो(Nato)

नाटो का पूरा नाम North Atlantic Treaty Organization(उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन) है जिसे 4 अप्रेल 1949 में अमेरिका के निर्देशन में बनाया था. इसका हेड क्वार्टर ब्रुस्लेस(बेल्जियम) में है. नाटो अपने निर्माण के प्रारम्भिक समय में सिर्फ एक राजनैतिक संगठन मात्र था. लेकिन कोरियाई युद्ध के बाद में अमेरिका ने नाटो का सैन्यकरण किया था. अब नाटो एक सैनिक संगठन है. जिसके निर्माण का उद्देश्य सोवियत संगठन का पतन करना था लेकिन सोवियत संगठन के पतन के बाद भी नाटो ना केवल आज तक अनवरत जारी है बल्कि रूस और युक्रेन युद्ध में अप्रत्यक्ष रूप से रूस के विरोध में युक्रेन को हर संभव मदद भी दे रहा है. इसलिए अगर चीन और ताइवान के बीच में भविष्य में जंग होती है तो चीन को सबसे कड़ी टक्कर नाटो से ही मिलेगी.

बाकि दुसरे यूरोपीय देश प्रत्यक्ष रूप से ताइवान की मदद नहीं कर पाएंगे.

अमेरिका(America)

अमेरिका को लोकतंत्र का आधार सतम्भ माना जाता है. अमेरिका खुदको लोकतंत्र का रक्षक बताता है ऐसे में अमेरिका चीन का दुश्मन बन जाता है और ताइवान का हमदर्द, इस तरह से अमेरिका हर तरह से ताइवान की मदद करेगा.

जब चीन (पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना) और ताइवान (रिपब्लिक ऑफ़ चाइना) के बीच संघर्ष हुआ तो 1950 में चीन ने ताइवान पर हमला किया था तो अमेरिका ने ताइवान की मदद को अपने जहाज भेजे जिससे ड्रेगन बौखला गया था और अमेरिका को अपना दुश्मन मानने लगा था. लेकिन 1976 में चीन के शासक माओ की मौत हो गई और नए शासक डेंग जिआओपिंग ने अमेरिका के प्रति दोस्ताना व्यवहार रखा जिससे अमेरिका चाइना की वन-चाइना पोलिसी को मानने पर राजी हो गया था. परिणामस्वरूप 1979 में अमेरिका और चाइना मे वन चाइना पोलिसी को लेकर समझौता हो गया था.

लेकिन बाद में अमेरिकी राष्ट्रिय कोंग्रेस ने एक प्रस्ताव पास किया जिसके तहत ए निश्चय किया गया की अमेरिका अब ताइवान को हथियार सप्लाई करेगा.  जो की चाइना की आँखों में रडकने लगा था इसलिए चीन और अमेरिका एक दुसरे के दुश्मन बन गए और आज भी अमेरिका ताइवान को हर तरह से मदद करता है.

हाल ही में अमेरिकी सीनेट Nancy Pelosi की ताईवान यात्रा को लेकर चाइना के रुख गर्म है, उसके बावजूद अमेरिका का कहना है की वो अपने मित्र राष्ट्र ताइवान की हर संभव मदद करेगा.

 

ये तो बात थी चीन और ताइवान के प्रत्यक्ष समर्थक देशों की लेकिन अगर कहीं भी जंग होती है तो इसका प्रभाव पुरे विश्व पर पड़ता है जैसे की रूस और युक्रेन के युद्ध से पुरे विश्व में आर्थिक महामंदी देखी जा सकती है. 

भारत किस और रहेगा

भारत किस और रहेगा ये कहना इतना आसान नहीं है, क्योंकि अगर भूतकाल की बात की जाये तो भारत ने हमेशा एक स्वतंत्र रवैया अपनाया है. लेकिन फिर भी इसे हम कुछ बिन्दुओ से समझने का प्रयास करते है.

उक्त बिन्दुओ के आधार पर हम ये अंदाज लगा सकते है की भारत के लोग और भारत की सरकार स्वतंत्र सोच के है और बाहरी मामलो में भारत सरकार हमेशा सोच समझ कर कदम उठाती है इसलिए भारत से सरकारी से उम्मीद की जा आसक्ति है की भारत सरकारी जो भी निर्णय लेगी जनता और देश के हित में सोच कर ही लेगी.

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